Bhakti Path

Bhakti Path

-दोहा छंद- वंदूँ श्री अरहंतपद, वीतराग विज्ञान। वरणूँ बारह भावना, जगजीवन-हित जान।।१।। -विष्णुपद छंद- कहाँ गये चक्री जिन जीता, भरतखंड सारा। कहाँ गये वह राम-रु-लक्ष्मण, जिन रावण मारा।। कहाँ कृष्ण रुक्मिणि सतभामा, अरु संपति सगरी। कहाँ गये वह रंगमहल अरु, सुवरन की नगरी।।२।। नहीं रहे वह लोभी कौरव जूझ मरे रनमें। गये राज तज पांडव वन को, अगनि लगी तनमें।। मोह-नींदसे उठ रे चेतन, तुझे जगवान को। हो दयाल उपदेश करैं गुरु, बारह भावन को।।३।। १. अथिर भावना सूरज चाँद छिपै निकलै ऋतु, फिर फिर कर आवै। प्यारी आयू ऐसी बीतै, पता नहीं पावै।। पर्वत-पतित-नदि-सरिता-जल बहकर नहिं हटता। स्वास चलत यों घटै काठ ज्यों, आरे सों कटता।।४।। ओस-बूँद ज्यों गलै धूप में, वा अंजुलि पानी। छिन छिन यौवन छीन होत है क्या समझै प्रानी।। इंद्रजाल आकाश नगर सम जग-संपति सारी। अथिर रूप संसार विचारो सब नर अरु नारी।।५।। २. अशरण भावना काल-सिंहने मृग-चेतन को घेरा भव वनमें। नहीं बचावन-हारा कोई यों समझो मनमें।। मंत्र यंत्र सेना धन संपति, राज पाट छूटे। वश नहिं चलता काल लुटेरा काय नगरि लूटै।।६।। चक्ररत्न हलधर सा भाई, काम नहीं आया। एक तीर के लगत कृष्ण की, विनश गई काया।। देव धर्म गुरु शरण जगत में, और नहीं कोई। भ्रम से फिरे भटकता चेतन, युंही उमर खोर्ई।।७।। ३. संसार भावना जनम-मरन अरु जरा-रोग से, सदा दु:खी रहता। द्रव्य क्षेत्र अरु काल भाव भव-परिवर्तन सहता।। छेदन भेदन नरक पशूगति, बंध बंधन सहना। राग-उदय से दु:ख सुरगति में, कहाँ सुखी रहना।।८।। भोगि पुण्यफल हो इकइंद्री, क्या इसमें लाली। कुतवाली दिनचार वही फिर, खुरपा अरु जाली।। मानुष-जन्म अनेक विपतिमय, कहीं न सुख देखा। पंचमगति सुख मिलै शुभाशुभको मेटो लेखा।।९।। ४. एकत्व भावना जन्मै मरै अकेला चेतन, सुख-दु:ख का भोगी। और किसी का क्या इक दिन यह, देह जुदी होगी।। कमला चलत न पैंड, जाय मरघट तक परिवारा। अपने अपने सुख को रोवैं, पिता पुत्र दारा।।१०।। ज्यों मेले में पंथीजन मिल नेह फिरैं धरते। ज्यों तरुवर पै रैन बसेरा पंछी आ करते।। कोस कोई दो कोस कोई उड़ फिर थक थक हारै। जाय अकेला हंस संग में, कोई न पर मारै।।११।। ५. अन्यत्व भावना मोह-रूप मृग-तृष्णा जग में मिथ्या जल चमकै। मृग चेतन नित भ्रम में उठ उठ, दौड़ैं थक थककै।। जल नहिं पावै प्राण गमावै, भटक भटक मरता। वस्तु परार्ई मानै अपनी, भेद नहीं करता।।१२।। तू चेतन अरु देव अचेतन, यह जड़ तू ज्ञानी। मिले-अनादि यतनतैं बिछुडै, ज्यों पय अरु पानी।। रूप तुम्हारा सबसों न्यारा, भेद ज्ञान करना। जौलों पौरुष थकै न तौलों उद्यमसों चरना।।१३।। ६. अशुचि भावना तू नित पोखै यह सूखे ज्यों, धोवैं त्यों मैली। निश दिन करै उपाय देह का, रोग-दशा फैली।। मात-पिता-रज-वीरज मिलकर, बनी देह तेरी। मांस हाड़ नश लहू राध की, प्रगट व्याधि घेरी।।१४।। काना पौंडा पड़ा हाथ यह चूसै तो रोवै। फलै अनंत जु धर्म ध्यान की, भूमि-विषै बोवै।। केसर चंदन पुष्प सुगंधित, वस्तु देख सारी। देह परसते होय अपावन, निशदिन मल जारी।।१५।। ७. आस्रव भावना ज्यों सर-जल आवत मोरी त्यों, आस्रव कर्मनको। दर्वित जीव प्रदेश गहै जब पुद्गल भरमनको।। भावित आस्रवभाव शुभाशुभ, निश दिन चेतन को। पाप पुण्य के दोनों करता, कारण बंधन को।।१६।। पन-मिथ्यात योग-पंद्रह द्वादश-अविरत जानो। पंचरु बीस कषाय मिले सब, सत्तावन मानो।। मोह-भावकी ममता टारै, पर परणति खोते। करै मोक्षका यतन निरास्रव, ज्ञानी जन होते।।१७।। ८. संवर भावना ज्यों मोरी में डाट लगावै, तब जल रुक जाता। त्यों आस्रवको रोकै संवर, क्यों नहिं मन लाता।। पंच महाव्रत समिति गुप्तिकर वचन काय मनको। दशविध-धर्म परीषह-बाइस, बारह भावनको।।१८।। यह सब भाव सतावन मिलकर, आस्रवको खोते। स्वप्न दशा से जागो चेतन, कहाँ पड़े सोते।। भाव शुभाशुभ रहित शुद्ध-भावन-संवर पावै। डाँट लगत यह नाव पड़ी मझधार पार जावै।।१९।। ९. निर्जरा भावना ज्यों सरवर जल रुका सूखता, तपन पड़ै भारी। संवर रोकै कर्म, निर्जरा ह्वै सौखनहारी।। उदय-भोग सविपाक-समय, पक जाय आम डाली। दूजी है अविपाक पकावै, पालविषै माली।।२०।। पहली सबके होय, नहीं कुछ सरै काम तेरा। दूजी करै जू उद्यम करकै, मिटै जगत फेरा।। संवर सहित करो तप प्रानी, मिलै मुकत रानी। इस दुलहिन की यही सहेली, जानै सब ज्ञानी।।२१।। १०. लोक भावना लोक अलोक अकाश माहिं थिर, निराधार जानो। पुरुष रूप-कर-कटी भये षट्, द्रव्यनसों मानो।। इसका कोई न करता हरता, अमिट अनादी है। जीवरु पुद्गल नाचै यामैं, कर्म उपाधी है।।२२।। पापपुण्यसों जीव जगत में, नित सुख-दु:ख भरता। अपनी करनी आप भरै शिर, औरन के धरता।। मोहकर्म को नाश, मेटकर सब जग की आसा। निज पद में थिर होय लोक के, शीश करो बासा।।२३।। ११. बोधि-दुर्लभ भावना दुर्लभ है निगोदसे थावर, अरु त्रस गति पानी। नरकाया को सुरपति तरसै, सो दुर्लभ प्रानी।। उत्तम देश सुसंगति दुर्लभ, श्रावककुल पाना। दुर्लभ सम्यक् दुर्लभ संयम, पंचम गुण ठाना।।२४।। दुर्लभ रत्नत्रय आराधन दीक्षा का धरना। दुर्लभ मुनिवर के व्रत पालन, शुद्धभाव करना।। दुर्लभ से दुर्लभ है चेतन, बोधिज्ञान पावै। पाकर केवलज्ञान, नहीं फिर इस भव में आवै।।२५।। १२. धर्म भावना धर्म अहिंसा परमो धर्म: ही सच्चा जानो। जो पर को दुख दे सुख माने, उसे पतित मानो।। रागद्वेष मद मोह घटा, आतमरुचि प्रकटावे। धर्मपोत पर चढ़ प्राणी, भवसिंधु पार जावे।।२६।। वीतराग सर्वज्ञ दोष बिन, श्री जिन की वानी। सप्त तत्त्व का वर्णन जामें, सबको सुखदानी।। इनका चितवन बार बार कर, श्रद्धा धर धरना। ‘मंगत’ इसी जतनतैं इकदिन, भव-सागर-तरना।।२७।।

-दोहा- राजा राणा छत्रपति, हाथिन के असवार। मरना सबको एक दिन, अपनी अपनी बार।।१।। दलबल देवी देवता, मात पिता परिवार। मरती विरियाँ जीव को, कोई न राखनहार।।२।। दाम बिना निर्धन दुखी, तृष्णावश धनवान। कहूँ न सुख संसार में, सब जग देख्यौ छान।।३।। आप अकेला अवतरे, मरे अकेला होय। यों कबहूँ या जीव को, साथी सगा न कोय।।४।। जहाँ देह अपनी नहीं, तहां न अपना कोय। घर संपत्ति पर प्रकट हैं, पर हैं परिजन लोय।।५।। दिपै चाम चादर मढ़ी, हाड़-पींजरा देह। भीतर या सम जगत में, और नहीं घिन गेह।।६।। -सोरठा- मोहनींद के जोर, जगवासी घूमें सदा। कर्मचोर चहुँओर, सरवस लूटें सुध नहीं।।७।। सतगुरु देय जगाय, मोह नींद जब उपशमै। तब कछु बनै उपाय, कर्म चोर आवत रुकैं।।८।। -दोहा- ज्ञानदीप तप तेल भर, घर शोधें भ्रम छोर। या विधि बिन निकसै नहीं, पैठे पूरब चोर।।९।। पंच महाव्रत संचरन, समिति पंच परकार। प्रबल पंच इन्द्रिय विजय, धार निर्जरा सार।।१०।। चौदह राजु उतंग नभ, लोक पुरुष संठान। तामें जीव अनादि तें, भरमत हैं बिन ज्ञान।।११।। धन-कन कंचन राज सुख, सबहि सुलभकर जान। दुर्लभ है संसार में, एक जथारथ ज्ञान।।१२।। जांचे सुरतरु देय सुख, चिन्तत चिन्ता रैन। बिन जांचे बिन चिंतये, धर्म सकल सुख दैन।।१३।।

-दोहा- बीज राख फल भोगवै, ज्यों किसान जग माहिं। त्यों चक्री नृप सुख करे, धर्म विसारै नाहिं।।१।। -जोगीरासा वा नरेन्द्र छंद- इहविधि राज करै नरनायक, भोगै पुण्य विशालो। सुखसागरमें रमत निरंतर, जात न जान्यो कालो।। एक दिवस शुभ कर्म-संजोगे, क्षेमंकर मुनि वंदे। देख शिरीगुरु के पदपंकज, लोचन अलि आनंदे।।२।। तीन प्रदक्षिण दे शिर नायो, कर पूजा थुति कीनी। साधु-समीप विनय कर बैठ्यो, चरननमें दिठि दीनी।। गुरु उपदेश्यो धर्म-शिरोमणि, सुन राजा वैरागे। राजरमा वनितादिक जे रस, ते रस बेरस लागे।।३।। मुनि-सूरज-कथनी-किरणावलि, लगत भरम बुधि भागी। भव-तन-भोग-स्वरूप विचार्यो, परम धरम अनुरागी।। इह संसार महावन भीतर, भरमत ओर न आवै। जामन मरन जरा दव दाहै जीव महादु:ख पावैं।।४।। कबहूँ जाय नरक थिति भुंजै, छेदन भेदन भारी। कबहूँ पशु परजाय धरै तहँ, बध बंधन भयकारी।। सुरगति में पर संपति देखे राग, उदय दु:ख होई। मानुषयोनि अनेक विपतिमय, सर्वसुखी नहिं कोर्ई।।५।। कोई इष्ट वियोगी विलखै, कोई अनिष्ट संयोगी। कोई दीन-दरिद्री विलखे, कोई तन के रोगी।। किसही घर कलिहारी नारी, कै बैरी सम भाई। किसही के दु:ख बाहिर दीखैं, किसही उर दुचिताई।।६।। कोई पुत्र बिना नित झूरै, होय मरै तब रोवै। खोटी संततिसों दु:ख उपजै, क्यों प्रानी सुख सोवै।। पुण्य उदय जिनके तिनके भी नाहिं सदा सुख साता। यह जगवास जथारथ देखे, सब दीखै दु:खदाता।।७।। जो संसार विषै सुख होता, तीर्थंकर क्यों त्यागै। काहे को शिवसाधन करते, संजमसो अनुरागै।। देह अपावन अथिर घिनावन, यामें सार न कोई। सागर के जलसों शुचि कीजे, तो भी शुद्ध न होई।।८।। सात कुधातुभरी मलमूरत, चर्म लपेटी सोहै। अंतर देखत या सम जग में, अवर अपावन को है।। नव-मल-द्वार स्रवैं निशि-वासर, नाम लिये घिन आवै। व्याधि-उपाधि अनेक जहाँ तहँ, कौन सुधी सुख पावे।।९।। पोषत तो दु:ख दोष करै अति, सोषत सुख उपजावै। दुर्जन-देह स्वभाव बराबर, मूरख प्रीति बढ़ावै।। राचन-जोग स्वरूप न याको विरचन जोग सही है। यह तन पाय महातप कीजे यामें सार यही है।।१०।। भोग बुरे भवरोग बढ़ावैं, बैरी हैं जग जीके। बेरस होंय विपाक समय अति, सेवत लागैं नीके।। वज्र-अगिनि विषसे विषधरसे, ये अधिके दु:खदाई। धर्म-रतन के चोर चपल अति, दुर्गति-पंथ सहाई।।११।। मोह-उदय यह जीव अज्ञानी, भोग भले कर जानै। ज्यों कोई जन खाय धतूरा, सो सब कंचन माने।। ज्यों ज्यों भोग संजोग मनोहर, मन-वांछित जन पावैं। तृष्णा नागिन त्यों-त्यों डंके, लहर जहर की आवे।।१२।। मैं चक्रीपद पाय निरन्तर, भोगे भोग घनेरे। तौ भी तनक भये नहिं पूरन, भोग मनारेथ मेरे।। राजसमाज महा अघ-कारण , बैर बढ़ावन-हारा। वेश्या सम लछमी अतिचंचल, याका कौन पत्यारा।।१३।। मोह-महा-रिपु बैर विचार्यो, जग-जिय संकट डारे। घर-कारागृह वनिता बेड़ी, परिजन जन रखवारे।। सम्यकदर्शन ज्ञान चरण तप, ये जियके हितकारी। येही सार असार और सब, यह चक्री चितधारी।।१४।। छोड़े चौदह रत्न नवों निधि, अरु छोड़े संग साथी। कोटि अठारह घोड़े छोड़े, चौरासी लख हाथी।। इत्यादिक संपत्ति बहुतेरी, जीरण-तृण-सम त्यागी। नीति विचार नियोगी सुतकों, राज दियो बड़भागी।।१५।। होय निशल्य अनेक नृपति संग, भूषण वसन उतारे। श्री गुरु चरण धरी जिन मुद्रा, पंच महाव्रत धारे।। धनि यह समझ सुबुद्धि जगोत्तम, धनि यह धीरज-धारी। ऐसी संपति छोड़ बसे वन, तिन पद धोक हमारी।।१६।। -दोहा- परिग्रहपोट उतार सब, लीनों चारित पंथ। निज स्वभाव में थिर भये, वङ्कानाभि निरग्रंथ।। ।।इति श्री वज्रनाभि चक्रवर्ती की वैराग्य भावना।।

जिसने राग द्वेष कामादिक जीते सब जग जान लिया। सब जीवों को मोक्षमार्ग का निस्पृह हो उपदेश दिया।। बुद्ध, वीर, जिन, हरि, हर, ब्रह्मा, या उसको स्वाधीन कहो। भक्ति-भाव से प्रेरित हो यह चित्त उसी में लीन रहो।।१।। विषयों की आशा नहिं जिनके साम्य-भाव धन रखते हैं। निज-परके हित-साधन में जो निश-दिन तत्पर रहते हैं।। स्वार्थ-त्याग की कठिन तपस्या बिना खेद जो करते हैं। ऐसे ज्ञानी साधु जगत के दु:ख समूह को हरते है।।२।। रहे सदा सत्संग उन्हीं का ध्यान उन्हीं का नित्य रहे। उनहीं जैसी चर्या में यह चित्त सदा अनुरक्त रहे।। नहीं सताऊँ किसी जीव को झूठ कभी नहिं कहा करूँ। परधन-वनिता पर न लुभाऊँ, संतोषामृत पिया करूँ।।३।। अहंकार का भाव न रक्खूँ नहीं किसी पर क्रोध करूँ। देख दूसरों की बढ़ती को कभी न ईष्र्या-भाव धरूँ।। रहे भावना ऐसी मेरी, सरल-सत्य-व्यवहार करूँ। बने जहाँ तक इस जीवन में औरों का उपकार करूँ।।४। मैत्रीभाव जगत में मेरा सब जीवों पर नित्य रहे। दीन-दु:खी जीवों पर मेरे उर से करुणा-स्रोत बहे।। दुर्जन-क्रूर-कुमार्ग-रतों पर क्षोभ नहीं मुझको आवे। साम्यभाव रक्खूँ मैं उन पर, ऐसी परिणति हो जावे।।५।। गुणी जनों को देख हृदय में मेरे प्रेम उमड़ आवे। बने जहाँ तक उनकी सेवा करके यह मन सुख पावे।। होऊँ नहीं कृतघ्न कभी मैं द्रोह न मेरे उर आवे। गुण-ग्रहण का भाव रहे नित दृष्टि न दोषों पर जावे।।६।। कोई बुरा कहो या अच्छा लक्ष्मी आवे या जावे। लाखों वर्षों तक जीऊँ या मृत्यु आज ही आ जावे।। अथवा कोई कैसा भी भय या लालच देने आवे। तो भी न्याय-मार्ग से मेरा कभी न पग डिगने पावे।।७।। होकर सुख में मग्न न फूले दुख में कभी न घबरावे। पर्वत-नदी-श्मशान भयानक अटवी से नहीं भय खावे।। रहे अडोल-अकम्प निरंतर यह मन दृढ़तर बन जावे। इष्ट-वियोग-अनिष्ट-योग में सहन-शीलता दिखलावे।।८।। सुखी रहें सब जीव जगत के कोई कभी न घबरावे। बैर-पाप अभिमान छोड़ जग नित्य नये मंगल गावें।। घर-घर चर्चा रहे धर्म की दुष्कृत दुष्कर हो जावे। ज्ञान-चरित उन्नत कर अपना मनुज-जन्म-फल सब पावें।।९।। ईति भीति व्यापे नहिं जग में वृष्टि समय पर हुआ करे। धर्मनिष्ठ होकर राजा भी न्याय प्रजा का किया करे।। रोग मरी दुर्भिक्ष न फैले प्रजा शांति से जिया करे। परम अहिंसा-धर्म जगत में फैल सर्व हित किया करे।।१०।। फैले प्रेम परस्पर जग में मोह दूर ही रहा करे। अप्रिय कटुक कठोर शब्द नहिं कोई मुख से कहा करे।। बनकर सब ‘युगवीर’ हृदय से, देशोन्नति-रत रहा करें। वस्तु-स्वरूप-विचार खुशी से, सब दुख संकट सहा करें।।११।।

—दोहा— वंदों पाँचों परमगुरु, चौबीसों जिनराज। करूं शुद्ध आलोचना, शुद्ध करन के काज ।।१।। -छंद—चौपाई - सुनिये जिन अरज हमारी, हम दोष किये अति भारी। तिनकी अब निर्वृति काजा, तुम शरण लही जिनराजा ।।२।। इक बे ते चउ इन्द्री वा, मन रहित सहित जे जीवा। तिनकी नहिं करुणाधारी, निर्दयी ह्वै घात विचारी ।।३।। समरंभ समारंभ आरम्भ, मन वच तन कीने प्रारम्भ। कृत कारित मोदन करिके, क्रोधादि चतुष्टय धरिके ।।४।। शत-आठ जु इन भेदन तें, अघ कीने पर छेदनतें। तिनकी कहूं कोलों कहानी, तुम जानत केवलज्ञानी ।।५।। विपरीत एकांत विनय के, संशय अज्ञान कुनय के। वश होय घोर अघ कीने, वचतें निंह जाय कहीने ।।६।। कुगुरुन की सेवा कीनी, केवल अदया कर भीनी । या विधि मिथ्यात्व बढ़ायो, चहुँगति मधि दोष उपायो ।।७।। हिंसा पुनि झूठ जु चोरी, पर वनिता सों दृग जोरी। आरम्भ परिग्रह भीनो, पन पाप जु या विधि कीनो ।।८।। सपरस रसना घ्रानन को, दृग कान विषय सेवन को। बहु कर्म किये मनमाने, कछु न्याय-अन्याय न जाने ।।९।। फल पंच उदम्बर खाए, मधु मांस मद्य चित चाये। नहिं अष्ट मूलगुण धारे, सेये कुविसन दुखकारे ।।१०।। दुइ बीस अभख जिन गाये, सो भी निशदिन भुंजाये । कछु भेदाभेद न पायो, ज्यों त्यों करि उदर भरायो ।।११।। अनंतानुबंधी सो जानो, प्रत्याख्यान अप्रत्याख्यानो । संज्वलन चौकड़ी गुनिये, सब भेद जु षोडश गुनिये ।।१२।। परिहास अरति रति शोक, भय ग्लानि त्रिवेद संजोग। पन बीस जु भेद भये इम, इनके वश पाप किये हम ।।१३।। निद्रावश शयन कराया, सुपने मधि दोष लगाई। फिर जागि विषय बन धायो, नाना विधि विषफल खायो ।।१४।। आहार निहार निहारा, इनमें नहीं जतन विचारा । बिन देखे धरी उठाई, बिन शोध वस्तु जु खाई ।।१५।। तब ही परमाद सतायो, बहु विधि विकल्प उपजायो। कुछ सुधि बुधि नाहि रही है, मिथ्यामति छाय गई है ।।१६।। मरजादा तुम ढिग लीनी, ताहू मे दोष जु कीनी। भिन भिन अब कैसे कहिए, तुम ज्ञान विषैं सब पइए ।।१७।। हा! हा! मैं दुठ अपराधी, त्रस जीवन राशि विराधी । थावर की जतन न कीनी, उर में करुणा नहिं लीनी ।।१८ पृथ्वी बहु खोद कराई, महलादिक जागाँ चिनाई। पुनि बिन गाल्यो जल ढोल्यो, पंखा तै पवन बिलोल्यो ।।१९।। हा! हा! मैं अदयाचारी, बहु हरितकाय जु विदारी । तामधि जीवन के खंदा, हम खाये धरि आनन्दा ।।२०।। हा! हा! परमाद बसाई, बिन देखे अग्नि जलाई । तामध्य जीव जे आए, ते हू परलोक सिधाए ।।२१।। बीध्यो अन राति पिसायो, ईंधन बिन सोधि जलायो । झाडू ले जांगा बुहारी, चींटी आदिक जीव बिदारी ।।२२।। जल छानि जिवानी कीनी, सो हू पुनि डार जू दीनी। नहिं जल थानक पहुंचाई, किरिया बिन पाप उपाई ।।२३।। जल-मल मोरिन गिरवायो, कृमि कुल बहु घात करायो। नदियन बिच चीर धुवाए, कोसन के जीव मराए ।।२४।। अन्नादिक शोध कराई, तातें जु जीव निसराई। तिनका नहिं जतन कराया, गलियारे धूप डराया ।।२५।। पुनि द्रव्य कमावन काजे, बहु आरम्भ हिंसा साजे। किए तिसनावश अघ भारी, करुणा नहिं रंच विचारी ।।२६।। इत्यादिक पाप अनंता, हम कीने श्री भगवंता। सन्तति चिरकाल उपाई, वाणी तैं कहिय न जाई ।।२७।। ताको जु उदय अब आयो , नाना विधि मोहि सतायो। फल भुंजत जिय दु:ख पावे , वचतैं कैसे करि गावें ।।२८।। तुम जानत केवलज्ञानी , दु:ख दूर करो शिवथानी। हम तो तुम शरण लही है , बिन तारन विरद सही है ।।२९।। इक गाँवपती जो होवे, सो भी दुखिया दु:ख खोवै । तुम तीन भुवन के स्वामी, दु:ख मेटो अंतरयामी ।।३०।। द्रौपदि को चीर बढ़ायो , सीता प्रति कमल रचायो। अंजन से किये अकामी, दु:ख मेटो अंतरयामी ।।३१।। मेरे अवगुण न चितारो, प्रभु अपनो विरद सम्हारो। सब दोष रहित कर स्वामी, दु:ख मेटहु अंतरजामी ।।३२।। इन्द्रादिक पद नहीं चाहूं , विषयनि में नाहिं लुभांऊ । रागादिक दोष हरीजे , परमातम निज पद दीजे ।।३३।। —दोहा— दोष रहित जिनदेवजी , निज पद दीज्यो मोय। सब जीवन को सुख बढ़ै , आनंद मंगल होय।।३४।। अनुभव माणिक पारखी , जौहरी आप जिनन्द। ये ही वर मोहि दीजिये , चरण शरण आनंद।।३५।।

भगवन्! सब जन तव पद युग की, शरण प्रेम से नहिं आते। उसमें हेतु विविधदु:खों से, भरित घोर भववारिधि है।। अतिस्पुâरित उग्र किरणों से, व्याप्त किया भूमंडल है। ग्रीषम ऋतु रवि राग कराता, इंदुकिरण छाया जल में।।१।। व्रुâद्धसर्प आशीविष डसने, से विषाग्नियुत मानव जो। विद्या औषध मंत्रित जल, हवनादिक से विष शांति हो।। वैसे तव चरणाम्बुज युग, स्तोत्र पढ़े जो मनुज अहो। तनु नाशक सब विघ्न शीघ्र, अति शांत हुये आश्चर्य अहो।।२।। तपे श्रेष्ठ कनकाचल की, शोभा से अधिक कांतियुत देव। तव पद प्रणमन करते जो, पीड़ा उनकी क्षय हो स्वयमेव।। उदित रवी की स्पुâट किरणों से, ताड़ित हो झट निकल भगे। जैसे नाना प्राणी लोचन, द्युतिहर रात्री शीघ्र भगे।।३।। त्रिभुवन जन सब जीत विजयि बन, अतिरौद्रात्मक मृत्युराज। भव भव में संसारी जन के, सन्मुख धावे अति विकराल।। किस विध कौन बचे जन इससे, काल उग्र दावानल से। यदि तव पाद कमल की स्तुति, नदी बुझावे नहीं उसे।।४।। लोकालोक निरन्तर व्यापी, ज्ञानमूर्तिमय शांति विभो। नानारत्न जटित दण्डेयुत, रुचिर श्वेत छत्रत्रय हैं।। तव चरणाम्बुज पूतगीत रव, से झट रोग पलायित हैं। जैसे सिंह भयंकर गर्जन, सुन वन हस्ती भगते हैं।।५।। दिव्यस्त्रीदृगसुन्दर विपुला, श्रीमेरू के चूड़ामणि। तव भामंडल बाल दिवाकर, द्युतिहर सबको इष्टअति।। अव्याबाध अचिंत्य अतुल, अनुपम शाश्वत जो सौख्य महान्। तव चरणारविंदयुगलस्तुति, से ही हो वह प्राप्त निधान।।६।। किरण प्रभायुत भास्कर भासित, करता उदित न हो जब तक। पंकजवन निंहं खिलते निद्रा-भार धारते हैं तब तक।। भगवन्! तव चरणद्वय का हो, नहीं प्रसादोदय जब तक। सभी जीवगण प्राय: करके, महत् पाप धारें तब तक।।७।। शांति जिनेश्वर शांतचित्त, से शांत्यर्थी बहु प्राणीगण। तव पादाम्बुज का आश्रय, ले शांत हुये हैं पृथिवी पर।। तव पदयुग की शांत्यष्टकयुत, संस्तुति करते भक्ती से। मुझ भाक्तिक पर दृष्टि प्रसन्न करो, भगवन्! करुणा करके।।८।। शशि सम निर्मल वक्त्र शांतिजिन, शीलगुण व्रत संयम पात्र। नमूँ जिनोत्तम अंबुजदृग को, अष्टशतार्चित लक्षण गात्र।।९।। चक्रधरों में पंचमचक्री, इन्द्र नरेन्द्र वृंद पूजित। गण की शांति चहूँ षोडश, तीर्थंकर नमूँ शांतिकर नित।।१०।। तरुअशोक सुरपुष्पवृष्टि, दुंदुभि दिव्यध्वनि सिंहासन। चमर छत्र भामंडल ये अठ, प्रातिहार्य प्रभु के मनहर।।११।। उन भुवनार्चित शांतिकरं, शिर से प्रणमूँं शांति प्रभु को। शांति करो सब गण को मुझको, पढ़ने वालोंं को भी हो।।१२।। मुकुटहारवुंâडल रत्नों युत, इन्द्रगणों से जो अर्चित। इन्द्रादिक से सुरगण से भी, पादपद्म जिनके संस्तुत।। प्रवरवंश में जन्में जग के, दीपक वे जिन तीर्थंकर। मुझको सतत् शांतिकर होवें, वे तीर्थेश्वर शांतीकर।।१३।। संपूजक प्रतिपालक जन, यतिवर सामान्य तपोधन को। देशराष्ट्र पुर नृप के हेतू, हे भगवन्! तुम शांति करो।।१४।। सभी प्रजा में क्षेम नृपति, धार्मिक बलवान् जगत् में हो। समय समय पर मेघवृष्टि हो, आधि व्याधि का भी क्षय हो।। चौर मारि दुर्भिक्ष न क्षण भी, जग में जन पीड़ा कर हो। नित ही सर्व सौख्यप्रद जिनवर, धर्मचक्र जयशील हो।।१५।। वे शुभद्रव्य क्षेत्र अरु काल, भाव वर्ते नित वृद्धि करें। जिनके अनुग्रह सहित मुमुक्षु, रत्नत्रय को पूर्ण करें।।१६।। घातिकर्म विध्वंसक जिनवर, केलवज्ञानमयी भास्कर। करें जगत में शांति सदा, वृषभादि जिनेश्वर तीर्थंकर।।१७।। -अंचलिका- हे भगवन्! श्री शांतिभक्ति का, कायोत्सर्ग किया उसके। आलोचन करने की इच्छा, करना चाहूँ मैं रुचि से।। अष्टमहा प्रातिहार्य सहित जो पंचमहाकल्याणक युत। चौंतिस अतिशय विशेष युत, बत्तिस देवेन्द्र मुकुट चर्चित।। हलधर वासुदेव प्रतिचक्री, ऋषि मुनि यति अनगार सहित। लाखों स्तुति के निलय वृषभ से, वीर प्रभू तक महापुरुष।। मंगल महापुरुष तीर्थंकर, उन सबको शुभ भक्ती से। नित्यकाल मैं अर्चूं पूजूँ, वंदूँ नमूँ महामुद से।। दु:खों का क्षय कर्मों का क्षय, हो मम बोधिलाभ होवे। सुगति गमन हो समाधिमरणं, मम जिनगुण संपति होवे।।

यदीये चैतन्ये मुकुर इव भावाश्चिदचित:। समं भान्ति ध्रौव्यव्ययजनिलसंतोऽन्तरहिता:।। जगत्साक्षी मार्गप्रकटनपरो भानुरिव यो। महावीरस्वामी नयनपथगामी भवतु मे (न:)।।१।। अताम्रं यच्चक्षु: कमलयुगलं स्पन्दरहितं। जनान्कोपापायं प्रकटयति वाभ्यन्तरमपि।। स्फूटं मूर्तिर्यस्य प्रशमितमयी वाति विमला। महावीरस्वामी नयनपथगामी भवतु मे (न:)।।२।। नमन्नाकेन्द्राली मुकुटमणि-भाजालजटिलं। लसत्पादाम्भोज-द्वयमिह यदीयं तनुभृतां।। भवज्वाला-शान्त्यै प्रभवति जलं वा स्मृतमपि। महावीरस्वामी नयनपथगामी भवतु मे (न:)।।३।। यदर्चाभावेन प्रमुदितमना दर्दुर इह। क्षणादासीत्स्वर्गी गुणगणसमृद्ध: सुखनिधि:।। लभंते सद्भक्ता: शिवसुखसमाजं किमु तदा। महावीरस्वामी नयनपथगामी भवतु मे (न:)।।४।। कनत्स्वर्णाभासोऽप्यपगत-तनुर्ज्ञाननिवहो। विचित्रात्माप्येको नृपतिवरसिद्धार्थतनय:।। अजन्मापि श्रीमान् विगतभवरागोद्भुत-गतिः ।। महावीरस्वामी नयनपथगामी भवतु मे (न:)।।५।। यदीया वाग्गङ्गा विविधनयकल्लोलविमला। वृहज्ज्ञानांभोभिर्जगति जनतां या स्नपयति।। इदानीमप्येषा बुधजनमरालै: परिचिता। महावीरस्वामी नयनपथगामी भवतु मे (न:)।।६।। अनिर्वारोद्रेकस्त्रिभुवनजयी काम-सुभट:। कुमारावस्थायामपि निजबलाद्येन विजित:।। स्फुरन्नित्यानन्द-प्रशमपद-राज्याय स जिन:। महावीरस्वामी नयनपथगामी भवतु मे (न:)।।७।। महामोहातंक-प्रशमनपरा-कस्मिकभिषङ्। निरापेक्षो बन्धुर्विदित-महिमा मंगलकर:।। शरण्य: साधूनां भवभयभृतामुत्तमगुणो। महावीरस्वामी नयनपथगामी भवतु मे (न:)।।८।। -अनुष्टुप् छंद- महावीराष्टकं स्तोत्रं, भक्त्या भागेन्दुना कृतं। य: पठेच्छ्रणुयाच्चापि, स याति परमां गतिम्।।९।। ।। इति महावीराष्टकं स्तोत्रम्।।

परमेष्ठिनमस्कारं, सारं नवपदात्मकम्। आत्मरक्षाकरं वज्र-पंजराख्यं स्मराम्यहम्।।१।। ॐ णमो अरहंताणं, शिरस्कन्धरसं स्थितम्। ॐ णमो सिद्धाणं, मुखे मुखपटाम्बरम्।।२।। ॐ णमो आइरियाणं, अंगरक्षातिशायिनी। ॐ णमो उवज्झायाणं, आयुधं हस्तोयोर्दृढम्।।३।। ॐ णमो लोए सव्वसाहूणं, मोचके पदयो: शुभे। एसो पंच णमोयारो, शिला वज्रमयी तले।।४।। सव्वपावप्पणासणो, वप्रो वज्रमयो बहि:। मंगलाणं च सव्वेसिं, खदिरांगारखातिका।।५।। स्वाहान्तं च पदं ज्ञेयं, पढमं हवइ मंगलम्। वप्रोपरि वज्रमयं, पिधानं देहरक्षणे।।६।। महाप्रभावरक्षेयं,, क्षुद्रोपद्रवनाशिनी। परमेष्ठीपदोद्भूता, कथिता पूर्वसूरिभि:।।७।। यश्चैवं कुरुते रक्षां, परमेष्ठिपदै: सदा। तस्य न स्याद् भयं व्याधि-राधिश्चापि कदाचन।।८।।

कल्याणमन्दिरमुदारमवद्य - भेदि - भीताभय - प्रदमनिन्दितमङ्घ्रिपद्मम्। संसारसागर - निमज्जदशेष-जन्तु- पोतायमानमभिनम्य जिनेश्वरस्य।।१।। यस्य स्वयं सुरगुरुर्गरिमाम्बुराशे:, स्तोत्रं सुविस्तृतमतिर्न विभुर्विधातुम्। तीर्थेश्वरस्य कमठस्मयधूमकेतो- स्तस्याहमेष किल संस्तवनं करिष्ये।।२।। सामान्यतोऽपि तव वर्णयितुं स्वरूप- मस्मादृश: कथमधीश! भवन्त्यधीशा:।। धृष्टोऽपि कौशिकशिशुर्यदि वा दिवान्धो, रूपं प्ररूपयति किन किल घर्मरश्मे:?।।३।। मोह-क्षयादनुभवन्नपि नाथ! मत्र्यो, नूनं गुणान्गणयितुं न तव क्षमेत। कल्पान्त-वान्त-पयस: प्रकटोऽपि यस्मा- न्मीयेत केन जलधे-र्ननु रत्नराशि:?।।४।। अभ्युद्यतोऽस्मि तव नाथ! जडाशयोऽपि, कर्तुं स्तवं लसदसंख्य-गुणाकरस्य। बालोऽपि किं न निजबाहु-युगं वितत्य, विस्तीर्णतां कथयति स्वधियाम्बुराशे:।।५।। ये योगिनामपि न यान्ति गुणास्तवेश! वत्तुंक़ कथं भवति तेषु ममावकाश:। जाता तदेव-मसमीक्षित-कारितेयं, जल्पन्ति वा निज-गिरा ननु पक्षिणोऽपि।।६।। आस्तामचिन्त्य-महिमा जिन! संस्तवस्ते, नामापि पाति भवतो भवतो जगन्ति। तीव्राऽऽतपोपहत-पान्थ-जनान्निदाघे, प्रीणाति पद्म-सरस: स-रसोऽनिलोऽपि।।७।। हृद्वर्तिनि त्वयि विभो! शिथिलीभवन्ति, जन्तो: क्षणेन निबिडा अपि कर्मबन्धा। सद्यो भुजङ्गम-मया इव मध्य-भाग- मभ्यागते वन-शिखण्डिनि चन्दनस्य।।८।। मुच्यन्त एव मनुजा: सहसा जिनेन्द्र! रौद्रै-रुपद्रव-शतैस्त्वयि वीक्षितेऽपि। गो-स्वामिनि स्पुरित-तेजसि दृष्टमात्रे, चौरैरिवाशु पशव: प्रपलायमानै:।।९।। त्वं तारको जिन! कथं भविनां त एव, त्वामुद्वहन्ति हृदयेन यदुत्तरन्त:। यद्वा दृतिस्तरति यज्जलमेष नून- मन्तर्गतस्य मरुत: स किलानुभाव:।।१०।। यस्मिन्हर-प्रभृतयोऽपि हत-प्रभावा:, सोऽपि त्वया रति-पति: क्षपित: क्षणेन। विध्यापिता हुतभुज: पयसाथ येन, पीतं न विं तदपि दुर्धर-वाडवेन?।।११।। स्वामिन्ननल्प-गरिमाणमपि प्रपन्ना- स्त्वां जन्तव: कथमहो हृदये दधाना:।। जन्मोदधिं लघु तरन्त्यतिलाघवेन, चिन्त्यो न हन्त महतां यदि वा प्रभाव:।।१२।। क्रोधस्त्वया यदि विभो! प्रथमं निरस्तो, ध्वस्तास्तदा १वद कथं किल कर्म-चौरा:? प्लोषत्यमुत्र यदि वा शिशिरापि लोके, नील-द्रुमाणि विपिनानि न किं हिमानी?।।१३।। त्वां योगिनो जिन! सदा परमात्मरूप, मन्वेषयन्ति हृदयाम्बुज-कोष-देशे। पूतस्य निर्मल-रुचेर्यदि वा किमन्य- दक्षस्य सम्भव-पदं ननु कर्णिकाया:।।१४।। ध्यानाज्जिनेश! भवतो भविन: क्षणेन, देहं विहाय परमात्म-दशां व्रजन्ति। तीव्रानलादुपल-भावमपास्य लोके, चामीकरत्वमचिरादिव धातु-भेदा:।।१५।। अन्त: सदैव जिन! यस्य विभाव्यसे त्वं, भव्यै: कथं तदपि नाशयसे शरीरम्। एतत्स्वरूपमथ मध्य-विवर्तिनो हि, यद्विग्रहं प्रशमयन्ति महानुभावा:।।१६।। आत्मा मनीषिभिरयं त्वदभेद-बुद्ध्या, ध्यातो जिनेन्द्र! भवतीह भवत्प्रभाव:। पानीयमप्यमृतमित्यनुचिन्त्यमानं, किं नाम नो विष-विकारमपाकरोति।।१७।। त्वामेव वीत-तमसं परवादिनोऽपि, नूनं विभो! हरि-हरादि-धिया प्रपन्ना:। किं काच-कामलिभिरीश! सितोऽपि शङ्खो, नो गृह्यते विविध-वर्ण-विपर्ययेण?।।१८।। धर्मोपदेश-समये सविधानुभावा- दास्तां जनो भवति ते तरुरप्यशोक:। अभ्युद्गते दिनपतौ समहीरुहोऽपि, किं वा विबोधमुपयाति न जीव-लोक:।।१९।। चित्रं विभो! कथमवाङ्मुख-वृन्तमेव, विष्वक्पतत्यवरला सुर-पुष्प-वृष्टि:। त्वद्गोचरे सुमनसां यदि वा मुनीश!, गच्छन्ति नूनमध एव हि बन्धनानि।।२०।। स्थाने गभीर-हृदयोदधि-सम्भवाया:, पीयूषतां तव गिर: समुदीरयन्ति। पीत्वा यत: परम-सम्मद-सङ्ग-भाजो, भव्या व्रजन्ति तरसाप्यजरामरत्वम्।।२१।। स्वामिन्सुदूरमवनम्य समुत्पतन्तो, मन्ये वदन्ति शुचय: सुर-चामरौघा:। येऽस्मै नतिं विदधते मुनि-पुङ्गवाय, ते नूनमूध्र्व-गतय: खलु शुद्ध-भावा:।।२२।। श्यामं गभीर-गिरमुज्ज्वल-हेम-रत्न सिंहासनस्थमिह भव्य-शिखण्डिनस्त्वाम्। आलोकयन्ति रभसेन नदन्तमुच्चै- श्चामीकराद्रि-शिरसीव नवाम्बुवाहम्।।२३। उद्गच्छता तव शिति-द्युति-मण्डलेन, लुप्तच्छदच्छविरशोक-तरुर्बभूव। सान्निध्यतोऽपि यदि वा तव वीतराग! नीरागतां व्रजति को न सचेतनोऽपि।।२४।। भो भो:! प्रमादमवधूय भजध्वमेन- मागत्य निर्वृति-पुरीं प्रति सार्थवाहम्। एतन्निवेदयति देव! जगत्त्रयाय, मन्ये नदन्नभिनभ: सुरदुन्दुभिस्ते।।२५।। उद्योतितेषु भवता भुवनेषु नाथ!, तारान्वितो विधुरयं विहताधिकार:। मुक्ता-कलाप-कलितोल्ल-सितातपत्र- व्याजात्त्रिधा धृत-तनुध्र्रुवमभ्युपेत:।।२६।। स्वेन प्रपूरित-जगत्त्रय-पिण्डितेन, कान्ति-प्रताप-यशसामिव संचयेन। माणिक्य-हेम-रजत-प्रविनिर्मितेन, १सालत्रयेण भगवन्नभितो विभासि।।२७।। दव्य-स्रजो जिन! नमत्त्रिदशाधिपाना- मुत्सृज्य रत्न-रचितानपि मौलि-बन्धान्। पादौ श्रयन्ति भवतो यदि वा परत्र१, त्वत्सङ्गमे सुमनसो न रमन्त एव।।२८।। त्वं नाथ! जन्मजलधेर्विपराङ् मुखोऽपि, यत्तारयस्यसुमतो निज-पृष्ठ-लग्नान्१। युत्तं हि पार्थिव-नृपस्य सतस्तवैव, चित्रं विभो! यदसि कर्म-विपाक-शून्य:।।२९।। विश्वेश्वरोऽपि जन-पालक! दुर्गतस्त्वं, किं वाऽक्षर-प्रकृतिरप्यलिपिस्त्वमीश! अज्ञानवत्यपि सदैव कथंचिदेव, ज्ञानं त्वयि स्पुरति विश्व-विकास-हेतु:।।३०।। प्राग्भार-सम्भृत-नभांसि रजांसि रोषा- दुत्थापितानि कमठेन शठेन यानि। छायापि तैस्तव न नाथ! हता हताशो, ग्रस्तस्त्वमीभिरयमेव परं दुरात्मा।।३१।। यद्गर्जदूर्जित-घनौघमदभ्र-भीम भ्रश्यत्तडिन्-मुसल-मांसल-घोरधारम्। दैत्येन मुक्तमथ दुस्तर-वारि दध्रे, तेनैव तस्य जिन! दुस्तर-वारिकृत्यम्।।३२।। ध्वस्तोध्र्व-केश-विकृताकृति-मत्र्य-मुण्ड- प्रालम्बभृद्भयदवक्त्र-विनिर्यदग्नि:। पे्रतव्रज: प्रति भवन्तमपीरितो य:, सोऽस्याभवत्प्रतिभवं भव-दु:ख-हेतु:।।३३।। धन्यास्त एव भुवनाधिप! ये त्रिसंध्य- माराधयन्ति विधिवद्विधुतान्य-कृत्या:। भक्त्योल्लसत्पुलक-पक्ष्मल-देह-देशा:, पादद्वयं तव विभो! भुवि जन्मभाज:।।३४।। अस्मिन्नपार-भव-वारि-निधौ मुनीश! मन्ये न मे श्रवण-गोचरतां गतोऽसि। आकर्णिते तु तव गोत्र-पवित्र-मन्त्रे, किं वा विपद्विषधरी सविधं समेति।।३५।। जन्मान्तरेऽपि तव पाद-युगं न देव! मन्ये मया महितमीहित-दान-दक्षम्। तेनेह जन्मनि मुनीश! पराभवानां, जातो निकेतनमहं मथिताशयानाम्।।३६।। नूनं न मोह-तिमिरावृतलोचनेन, पूर्वं विभो! सकृदपि प्रविलोकितोऽसि। मर्माविधो विधुरयन्ति हि मामनर्था:, प्रोद्यत्प्रबन्ध-गतय: कथमन्यथैते।।३७।। आकर्णितोऽपि महितोऽपि निरीक्षितोऽपि, नूनं न चेतसि मया विधृतोऽसि भक्त्या। जातोऽस्मि तेन जनबान्धव! दु:खपात्रं, यस्मात्क्रिया: प्रतिफलन्ति न भाव-शून्या:।।३८।। त्वं नाथ! दु:खि-जन-वत्सल! हे शरण्य! कारुण्य-पुण्य-वसते! वशिनां वरेण्य। भक्त्या नते मयि महेश! दयां विधाय, दुखांकुरोद्दलन-तत्परतां विधेहि।।३९।। नि:संख्य-सार-शरणं शरणं शरण्य- मासाद्य सादित-रिपु-प्रथितावदानम्। त्वत्पाद-पंकजमपि प्रणिधान-वन्ध्यो, बन्ध्योऽस्मि चेद् भुवन-पावन! हा हतोऽस्मि।।४०।। देवेन्द्रवन्द्य! विदिताखिल-वस्तु-सार! संसार-तारक! विभो! भुवनाधिनाथ!। त्रायस्व देव! करुणा-हृद! मां पुनीहि, सीदन्तमद्य भयद-व्यसनाम्बु-राशे:।।४१।। यद्यस्ति नाथ! भवदङ्घ्रि-सरोरुहाणां, भत्ते: फलं किमपि सन्ततसञ्चिताया:। तन्मे त्वदेक-शरणस्य शरण्य! भूया:, स्वामी त्वमेव भुवनेऽत्र भवान्तरेऽपि।।४२।। इत्थं समाहित-धियो विधिवज्जिनेन्द्र! सान्द्रोल्लसत्पुलक-कञ्चुकिताङ्गभागा:। त्वद्बिम्ब-निर्मल-मुखाम्बुज-बद्ध-लक्ष्या, ये संस्तवं तव विभो! रचयन्ति भव्या:।।४३।। जननयन ‘कुमुदचन्द्र’! प्रभास्वरा: स्वर्ग-सम्पदो भुक्त्वा। ते विगलित-मल-निचया, अचिरान्मोक्षं प्रपद्यन्ते।।४४।।

नरेन्द्रं फणीन्द्रं सुरेन्द्रं अधीशं, शतेन्द्रं सु पुजै भजै नाय शीशं । मुनीन्द्रं गणीन्द्रं नमे हाथ जोड़ि, नमो देव देवं सदा पार्श्वनाथं ॥१॥ गजेन्द्रं मृगेन्द्रं गह्यो तू छुडावे, महा आगतै नागतै तू बचावे । महावीरतै युद्ध में तू जितावे, महा रोगतै बंधतै तू छुडावे ॥२॥ दुखी दुखहर्ता सुखी सुखकर्ता, सदा सेवको को महा नन्द भर्ता । हरे यक्ष राक्षस भूतं पिशाचं, विषम डाकिनी विघ्न के भय अवाचं ॥३॥ दरिद्रीन को द्रव्य के दान दीने, अपुत्रीन को तू भले पुत्र कीने । महासंकटों से निकारे विधाता, सबे सम्पदा सर्व को देहि दाता ॥४॥ महाचोर को वज्र को भय निवारे, महपौन को पुंजतै तू उबारे । महाक्रोध की अग्नि को मेघधारा, महालोभ शैलेश को वज्र मारा ॥५॥ महामोह अंधेर को ज्ञान भानं, महा कर्म कांतार को धौ प्रधानं । किये नाग नागिन अधो लोक स्वामी, हरयो मान दैत्य को हो अकामी ॥६॥ तुही कल्पवृक्षं तुही कामधेनं, तुही दिव्य चिंतामणि नाग एनं । पशु नर्क के दुःखतै तू छुडावे, महास्वर्ग में मुक्ति में तू बसावे ॥७॥ करे लोह को हेम पाषण नामी, रटे नाम सो क्यों ना हो मोक्षगामी । करै सेव ताकी करै देव सेवा, सुने बैन सोही लहे ज्ञान मेवा ॥८॥ जपै जाप ताको नहीं पाप लागे, धरे ध्यान ताके सबै दोष भागे । बिना तोहि जाने धरे भव घनेरे, तुम्हारी कृपातै सरै काज मेरे ॥९॥ गणधर इंद्र न कर सके, तुम विनती भगवान । द्यानत प्रीति निहार के, कीजे आप सामान ॥१०॥

शीश नवा अरिहन्त को, सिद्धन करूँ प्रणाम । उपाध्याय आचार्य का, ले सुखकारी नाम ।।१।। सर्व साधु और सरस्वती, जिन मंदिर सुखकार । महावीर भगवान को, मन मंदिर में धर ।।२।। जय महावीर दयालु स्वामी, वीर प्रभु तुम जग में नामी ।।३।। वर्धमान है नाम तुम्हारा, लगे हृदय को प्यारा प्यारा ।।४।। शांति छवि और मोहनी मूरत, शांत हँसीली सोहनी सूरत ।।५।। तुमने वेष दिगम्बर धरा, कर्म शत्रु भी तुम से हारा ।।६।। क्रोध मान और लोभ भगाया, माया-मोह तुमसे डर खाया ।।७।। तू सर्वज्ञ सर्व का ज्ञाता, तुझको दुनिया से क्या नाता ।।८।। तुझमें नहीं राग और द्वेष, वीतराग तू हितोपदेश ।।९।। तेरा नाम जगत में सच्चा, जिसको जाने बच्चा-बच्चा ।।१०।। भूत प्रेत तुम से भय खावें, व्यंतर-राक्षस सब भग जावें ।।११।। महा व्याध मारी न सतावे, महा विकराल काल डर खावें ।।१२।। काला नाग होय फन धारी, या हो शेर भयंकर भारी ।।१३।। न हो कोर्इ बचाने वाला, स्वामी तुम्हीं करो प्रतिपाला ।।१४।। अगनि दावानल सुलग रही हो, तेज हवा से भड़क रही हो ।।१५।। नाम तुम्हारा सब दुख खोवे, आग एकदम ठण्डी होवे ।।१६।। हिंसामय था जग विस्तारा, तब तुमने कीना निस्तारा ।।१७।। जन्म लिया कुंडलपुर नगरी, हुर्इ सुखी तब प्रजा सगरी ।।१८।। सिद्धारथ जी पिता तुम्हारे, ​त्रिशला के आँखों के तारे ।।१९।। छोड़ सभी झंझट संसारी, स्वामी हुए बाल ब्रह्मचारी ।।२०।। पंचम काल महा दुखदार्इ, चाँदनपुर महिमा दिखलार्इ ।।२१।। टीले में अतिशय दिखलाया, एक गाय का दूध गिराया ।।२२।। सोच हुआ मन में ग्वाले के, पहुँचा एक फावड़ा लेके ।।२३।। सारा टीला खोद गिराया, तब तुमने दर्शन दिखलाया ।।२४।। जोधराज को दुख ने घेरा, उसने नाम जपा तब तेरा ।।२५।। ठण्डा हुआ तोप का गोला, तब सबने जयकारा बोला ।।२६।। मंत्री ने मंदिर बनवाया, राजा ने भी दरब लगाया ।।२७।। बड़ी धर्मशाला बनवार्इ, तुमको लाने को ठहरार्इ ।।२८।। तुमने तोड़ी बीसों गाड़ी, पहिया मसका नहीं अगाड़ी ।।२९।। ग्वाले ने जो हाथ लगाया, फिर तो रथ चलता ही पाया ।।३०।। पहिले दिन बैशाख बदी के, रथ जाता है तीर नदी के ।।३१।। मीना गूजर सब ही आते, नाच-कूद सब चित्त उमगाते ।।३२।। स्वामी तुमने प्रेम निभाया, ग्वाले का तुम मान बढ़ाया ।।३३।। हाथ लगे ग्वाले का जब ही, स्वामी रथ चलता है तब ही ।।३४।। मेरी है टूटी सी नैया, तुम बिन कोर्इ नहीं खिवैया ।।३५।। मुझ पर स्वामी जरा कृपा कर, मैं हूँ प्रभू तुम्हारा चाकर ।।३६।। तुमसे मैं अरु कछु नहीं चाहूँ, जन्म-जन्म तेरे दर्शन पाउँफ ।।३७।। चालीसे को ‘चन्द्र’ बनावें, वीर प्रभू को शीश नवावें ।।३८।। नित चालीसहिं बार, पाठ करे चालीस दिन । खेय सुगंध अपार, वर्धमान के सामने ।।३९।। होय कुबेर समान, जन्म दरिद्री होय जो । जिसके नहिं संतान, नाम वश जग में चले ।।४०।।

शीश नवा अरिहंत को, सिद्धन करूँ प्रणाम । उपाध्याय आचार्य का ले सुखकारी नाम। । सर्व साधु और सरस्वती, जिन-मंदिर सुखकार । अहिच्छत्र और पार्श्व को, मन-मंदिर में धार ।। पार्श्वनाथ जगत्-हितकारी, हो स्वामी तुम व्रत के धारी । सुर-नर-असुर करें तुम सेवा, तुम ही सब देवन के देवा ।।१।। तुमसे करम-शत्रु भी हारा, तुम कीना जग का निस्तारा । अश्वसैन के राजदुलारे, वामा की आँखों के तारे ।।२।। काशी जी के स्वामी कहाये, सारी परजा मौज उड़ाये । इक दिन सब मित्रों को लेके, सैर करन को वन में पहुँचे ।।३।। हाथी पर कसकर अम्बारी, इक जगंल में गर्इ सवारी । एक तपस्वी देख वहाँ पर, उससे बोले वचन सुनाकर ।।४।। तपसी! तुम क्यों पाप कमाते, इस लक्कड़ में जीव जलाते । तपसी तभी कुदाल उठाया, उस लक्कड़ को चीर गिराया ।।५।। निकले नाग-नागनी कारे, मरने के थे निकट बिचारे । रहम प्रभु के दिल में आया, तभी मंत्र-नवकार सुनाया ।।६।। मरकर वो पाताल सिधाये, पद्मावति-धरणेन्द्र कहाये । तपसी मरकर देव कहाया, नाम ‘कमठ’ ग्रन्थों में गाया ।।७।। एक समय श्री पारस स्वामी, राज छोड़कर वन की ठानी । तप करते थे ध्यान लगाये, इक-दिन ‘कमठ’ वहाँ पर आये ।।८।। फौरन ही प्रभु को पहिचाना, बदला लेना दिल में ठाना । बहुत अधिक बारिश बरसार्इ, बादल गरजे बिजली गिरार्इ ।।९।। बहुत अधिक पत्थर बरसाये, स्वामी तन को नहीं हिलाये । पद्मावती-धरणेन्द्र भी आए, प्रभु की सेवा में चित लाए ।।१०।। धरणेन्द्र ने फन फैलाया, प्रभु के सिर पर छत्र बनाया । पद्मावति ने फन फैलाया, उस पर स्वामी को बैठाया ।।११।। कर्मनाश प्रभु ज्ञान उपाया, समोसरण देवेन्द्र रचाया । यही जगह ‘अहिच्छत्र‘ कहाये, पात्रकेशरी जहाँ पर आये ।।१२।। शिष्य पाँच सौ संग विद्वाना, जिनको जाने सकल जहाना । पार्श्वनाथ का दर्शन पाया, सबने जैन-धरम अपनाया ।।१३।। ‘अहिच्छत्र‘ श्री सुन्दर नगरी, जहाँ सुखी थी परजा सगरी । राजा श्री वसुपाल कहाये, वो इक जिन-मंदिर बनवाये ।।१४।। प्रतिमा पर पालिश करवाया, फौरन इक मिस्त्री बुलवाया । वह मिस्तरी माँस था खाता, इससे पालिश था गिर जाता ।।१५।। मुनि ने उसे उपाय बताया, पारस-दर्शन-व्रत दिलवाया । मिस्त्री ने व्रत-पालन कीना, फौरन ही रंग चढ़ा नवीना ।।१६।। गदर सतावन का किस्सा है, इक माली का यों लिक्खा है । वह माली प्रतिमा को लेकर, झट छुप गया कुएँ के अंदर ।।१७।। उस पानी का अतिशय-भारी, दूर होय सारी बीमारी । जो अहिच्छत्र हृदय से ध्यावे, सो नर उत्तम-पदवी पावे ।।१८।। पुत्र-संपदा की बढ़ती हो, पापों की इकदम घटती हो । है तहसील आँवला भारी, स्टेशन पर मिले सवारी ।।१९।। रामनगर इक ग्राम बराबर, जिसको जाने सब नारी-नर । चालीसे को ‘चंद्र’ बनाये, हाथ जोड़कर शीश नवाये ।।२०।। नित चालीसहिं बार, पाठ करे चालीस दिन । खेय सुगंध अपार, अहिच्छत्र में आय के ।। होय कुबेर-समान, जन्म-दरिद्री होय जो । जिसके नहिं संतान, नाम-वंश जग में चले ।।

वीतराग सर्वज्ञ जिन, जिनवाणी को ध्याय | लिखने का साहस करूँ, चालीसा सिर-नाय ||१|| देहरे के श्री चंद्र को, पूजौं मन-वच-काय || ऋद्धि-सिद्धि मंगल करें, विघ्न दूर हो जाय ||२|| जय श्री चंद्र दया के सागर, देहरेवाले ज्ञान-उजागर ||३|| शांति-छवि मूरति अति-प्यारी, भेष-दिगम्बर धारा भारी ||४|| नासा पर है दृष्टि तुम्हारी, मोहनी-मूरति कितनी प्यारी |५|| देवों के तुम देव कहावो, कष्ट भक्त के दूर हटावो ||६|| समंतभद्र मुनिवर ने ध्याया, पिंडी फटी दर्श तुम पाया ||७|| तुम जग में सर्वज्ञ कहावो, अष्टम-तीर्थंकर कहलावो ||८|| महासेन के राजदुलारे, मात सुलक्षणा के हो प्यारे ||९|| चंद्रपुरी नगरी अतिनामी, जन्म लिया चंद्र-प्रभ स्वामी ||१०|| पौष-वदी-ग्यारस को जन्मे, नर-नारी हरषे तब मन में ||११|| काम-क्रोध-तृष्णा दु:खकारी, त्याग सुखद मुनिदीक्षा-धारी ||१२|| फाल्गुन-वदी-सप्तमी भार्इ, केवलज्ञान हुआ सुखदार्इ ||१३|| फिर सम्मेद-शिखर पर जाके, मोक्ष गये प्रभु आप वहाँ से ||१४|| लोभ-मोह और छोड़ी माया, तुमने मान-कषाय नसाया ||१५|| रागी नहीं नहीं तू द्वेषी, वीतराग तू हित-उपदेशी ||१६|| पंचम-काल महा दु:खदार्इ, धर्म-कर्म भूले सब भार्इ ||१७|| अलवर-प्रांत में नगर तिजारा, होय जहाँ पर दर्शन प्यारा ||१८|| उत्तर-दिशि में देहरा-माँहीं, वहाँ आकर प्रभुता प्रगटार्इ ||१९|| सावन सुदि दशमी शुभ नामी, प्रकट भये त्रिभुवन के स्वामी ||२०|| चिहन चंद्र का लख नर-नारी, चंद्रप्रभ की मूरती मानी ||२१|| मूर्ति आपकी अति-उजियाली, लगता हीरा भी है जाली ||२२|| अतिशय चंद्रप्रभ का भारी, सुनकर आते यात्री भारी ||२३|| फाल्गुन-सुदी-सप्तमी प्यारी, जुड़ता है मेला यहाँ भारी ||२४|| कहलाने को तो शशिधर हो, तेज-पुंज रवि से बढ़कर हो ||२५|| नाम तुम्हारा जग में साँचा, ध्यावत भागत भूत-पिशाचा ||२६|| राक्षस-भूत-प्रेत सब भागें, तुम सुमिरत भय कभी न लागे ||२७|| कीर्ति तुम्हारी है अतिभारी, गुण गाते नित नर और नारी ||२८|| जिस पर होती कृपा तुम्हारी, संकट झट कटता है भारी ||२९|| जो भी जैसी आश लगाता, पूरी उसे तुरत कर पाता ||३०|| दु:खिया दर पर जो आते हैं, संकट सब खोकर जाते हैं ||३१|| खुला सभी हित प्रभु-द्वार है, चमत्कार को नमस्कार है ||३२|| अंधा भी यदि ध्यान लगावे, उसके नेत्र शीघ्र खुल जावें ||३३|| बहरा भी सुनने लग जावे, पगले का पागलपन जावे ||३४|| अखंड-ज्योति का घृत जो लगावे, संकट उसका सब कट जावे ||३५|| चरणों की रज अति-सुखकारी, दु:ख-दरिद्र सब नाशनहारी ||३६|| चालीसा जो मन से ध्यावे,पुत्र-पौत्र सब सम्पति पावे ||३७|| पार करो दु:खियों की नैया, स्वामी तुम बिन नहीं खिवैया ||३८|| प्रभु मैं तुम से कुछ नहिं चाहूँ, दर्श तिहारा निश-दिन पाऊँ ||३९|| करूँ वंदना आपकी, श्री चंद्रप्रभ जिनराज | जंगल में मंगल कियो, रखो ‘सुरेश’ की लाज ||४०||

आदिपुरुष आदीश जिन, आदि सुविधि करतार। धरम-धुरंधर परमगुरु, नमों आदि अवतार॥ सुर-नत-मुकुट रतन-छवि करैं, अंतर पाप-तिमिर सब हरैं। जिनपद बंदों मन वच काय, भव-जल-पतित उधरन-सहाय॥1॥ श्रुत-पारग इंद्रादिक देव, जाकी थुति कीनी कर सेव। शब्द मनोहर अरथ विशाल, तिस प्रभु की वरनों गुन-माल॥2॥ विबुध-वंद्य-पद मैं मति-हीन, हो निलज्ज थुति-मनसा कीन। जल-प्रतिबिंब बुद्ध को गहै, शशि-मंडल बालक ही चहै॥3॥ गुन-समुद्र तुम गुन अविकार, कहत न सुर-गुरु पावै पार। प्रलय-पवन-उद्धत जल-जन्तु, जलधि तिरै को भुज बलवन्तु॥4॥ सो मैं शक्ति-हीन थुति करूँ, भक्ति-भाव-वश कछु नहिं डरूँ। ज्यों मृगि निज-सुत पालन हेतु, मृगपति सन्मुख जाय अचेत॥5॥ मैं शठ सुधी हँसन को धाम, मुझ तव भक्ति बुलावै राम। ज्यों पिक अंब-कली परभाव, मधु-ऋतु मधुर करै आराव॥6॥ तुम जस जंपत जन छिनमाहिं, जनम-जनम के पाप नशाहिं। ज्यों रवि उगै फटै तत्काल, अलिवत नील निशा-तम-जाल॥7॥ तव प्रभावतैं कहूँ विचार, होसी यह थुति जन-मन-हार। ज्यों जल-कमल पत्रपै परै, मुक्ताफल की द्युति विस्तरै॥8॥ तुम गुन-महिमा हत-दुख-दोष, सो तो दूर रहो सुख-पोष। पाप-विनाशक है तुम नाम, कमल-विकाशी ज्यों रवि-धाम॥9॥ नहिं अचंभ जो होहिं तुरंत, तुमसे तुम गुण वरणत संत। जो अधीन को आप समान, करै न सो निंदित धनवान॥10॥ इकटक जन तुमको अविलोय, अवर-विषैं रति करै न सोय। को करि क्षीर-जलधि जल पान, क्षार नीर पीवै मतिमान॥11॥ प्रभु तुम वीतराग गुण-लीन, जिन परमाणु देह तुम कीन। हैं तितने ही ते परमाणु, यातैं तुम सम रूप न आनु॥12॥ कहँ तुम मुख अनुपम अविकार, सुर-नर-नाग-नयन-मनहार। कहाँ चंद्र-मंडल-सकलंक, दिन में ढाक-पत्र सम रंक॥13॥ पूरन चंद्र-ज्योति छबिवंत, तुम गुन तीन जगत लंघंत। एक नाथ त्रिभुवन आधार, तिन विचरत को करै निवार॥14॥ जो सुर-तिय विभ्रम आरंभ, मन न डिग्यो तुम तौ न अचंभ। अचल चलावै प्रलय समीर, मेरु-शिखर डगमगै न धीर॥15॥ धूमरहित बाती गत नेह, परकाशै त्रिभुवन-घर एह। बात-गम्य नाहीं परचण्ड, अपर दीप तुम बलो अखंड॥16॥ छिपहु न लुपहु राहु की छांहि, जग परकाशक हो छिनमांहि। घन अनवर्त दाह विनिवार, रवितैं अधिक धरो गुणसार॥17॥ सदा उदित विदलित मनमोह, विघटित मेघ राहु अविरोह। तुम मुख-कमल अपूरव चंद, जगत-विकाशी जोति अमंद॥18॥ निश-दिन शशि रवि को नहिं काम, तुम मुख-चंद हरै तम-धाम। जो स्वभावतैं उपजै नाज, सजल मेघ तैं कौनहु काज॥19॥ जो सुबोध सोहै तुम माहिं, हरि हर आदिक में सो नाहिं। जो द्युति महा-रतन में होय, काच-खंड पावै नहिं सोय॥20॥ (हिन्दी में) नाराच छन्द : सराग देव देख मैं भला विशेष मानिया। स्वरूप जाहि देख वीतराग तू पिछानिया॥ कछू न तोहि देखके जहाँ तुही विशेखिया। मनोग चित-चोर और भूल हू न पेखिया॥21॥ अनेक पुत्रवंतिनी नितंबिनी सपूत हैं। न तो समान पुत्र और माततैं प्रसूत हैं॥ दिशा धरंत तारिका अनेक कोटि को गिनै। दिनेश तेजवंत एक पूर्व ही दिशा जनै॥22॥ पुरान हो पुमान हो पुनीत पुण्यवान हो। कहें मुनीश अंधकार-नाश को सुभान हो॥ महंत तोहि जानके न होय वश्य कालके। न और मोहि मोखपंथ देय तोहि टालके॥23॥ अनन्त नित्य चित्त की अगम्य रम्य आदि हो। असंख्य सर्वव्यापि विष्णु ब्रह्म हो अनादि हो॥ महेश कामकेतु योग ईश योग ज्ञान हो। अनेक एक ज्ञानरूप शुद्ध संतमान हो॥24॥ तुही जिनेश बुद्ध है सुबुद्धि के प्रमानतैं। तुही जिनेश शंकरो जगत्त्रये विधानतैं॥ तुही विधात है सही सुमोखपंथ धारतैं। नरोत्तमो तुही प्रसिद्ध अर्थ के विचारतैं॥25॥ नमो करूँ जिनेश तोहि आपदा निवार हो। नमो करूँ सुभूरि-भूमि लोकके सिंगार हो॥ नमो करूँ भवाब्धि-नीर-राशि-शोष-हेतु हो। नमो करूँ महेश तोहि मोखपंथ देतु हो॥26॥ चौपाई (15 मात्रा) तुम जिन पूरन गुन-गन भरे, दोष गर्वकरि तुम परिहरे। और देव-गण आश्रय पाय, स्वप्न न देखे तुम फिर आय॥27॥ तरु अशोक-तर किरन उदार, तुम तन शोभित है अविकार। मेघ निकट ज्यों तेज फुरंत, दिनकर दिपै तिमिर निहनंत॥28॥ सिंहासन मणि-किरण-विचित्र, तापर कंचन-वरन पवित्र। तुम तन शोभित किरन विथार, ज्यों उदयाचल रवि तम-हार॥29॥ कुंद-पुहुप-सित-चमर ढुरंत, कनक-वरन तुम तन शोभंत। ज्यों सुमेरु-तट निर्मल कांति, झरना झरै नीर उमगांति ॥30॥ ऊँचे रहैं सूर दुति लोप, तीन छत्र तुम दिपैं अगोप। तीन लोक की प्रभुता कहैं, मोती-झालरसों छवि लहैं॥31॥ दुंदुभि-शब्द गहर गंभीर, चहुँ दिशि होय तुम्हारे धीर। त्रिभुवन-जन शिव-संगम करै, मानूँ जय जय रव उच्चरै॥32॥ मंद पवन गंधोदक इष्ट, विविध कल्पतरु पुहुप-सुवृष्ट। देव करैं विकसित दल सार, मानों द्विज-पंकति अवतार॥33॥ तुम तन-भामंडल जिनचन्द, सब दुतिवंत करत है मन्द। कोटि शंख रवि तेज छिपाय, शशि निर्मल निशि करे अछाय॥34॥ स्वर्ग-मोख-मारग-संकेत, परम-धरम उपदेशन हेत। दिव्य वचन तुम खिरें अगाध, सब भाषा-गर्भित हित साध॥35॥ दोहा : विकसित-सुवरन-कमल-दुति, नख-दुति मिलि चमकाहिं। तुम पद पदवी जहं धरो, तहं सुर कमल रचाहिं॥36॥ ऐसी महिमा तुम विषै, और धरै नहिं कोय। सूरज में जो जोत है, नहिं तारा-गण होय॥37॥ (हिन्दी में) षट्पद : मद-अवलिप्त-कपोल-मूल अलि-कुल झंकारें। तिन सुन शब्द प्रचंड क्रोध उद्धत अति धारैं॥ काल-वरन विकराल, कालवत सनमुख आवै। ऐरावत सो प्रबल सकल जन भय उपजावै॥ देखि गयंद न भय करै तुम पद-महिमा लीन। विपति-रहित संपति-सहित वरतैं भक्त अदीन॥38॥ अति मद-मत्त-गयंद कुंभ-थल नखन विदारै। मोती रक्त समेत डारि भूतल सिंगारै॥ बांकी दाढ़ विशाल वदन में रसना लोलै। भीम भयानक रूप देख जन थरहर डोलै॥ ऐसे मृग-पति पग-तलैं जो नर आयो होय। शरण गये तुम चरण की बाधा करै न सोय॥39॥ प्रलय-पवनकर उठी आग जो तास पटंतर। बमैं फुलिंग शिखा उतंग परजलैं निरंतर॥ जगत समस्त निगल्ल भस्म करहैगी मानों। तडतडाट दव-अनल जोर चहुँ-दिशा उठानों॥ सो इक छिन में उपशमैं नाम-नीर तुम लेत। होय सरोवर परिन मैं विकसित कमल समेत॥40॥ कोकिल-कंठ-समान श्याम-तन क्रोध जलन्ता। रक्त-नयन फुंकार मार विष-कण उगलंता॥ फण को ऊँचा करे वेग ही सन्मुख धाया। तब जन होय निशंक देख फणपतिको आया॥ जो चांपै निज पगतलैं व्यापै विष न लगार। नाग-दमनि तुम नामकी है जिनके आधार॥41॥ जिस रन-माहिं भयानक रव कर रहे तुरंगम। घन से गज गरजाहिं मत्त मानों गिरि जंगम॥ अति कोलाहल माहिं बात जहँ नाहिं सुनीजै। राजन को परचंड, देख बल धीरज छीजै॥ नाथ तिहारे नामतैं सो छिनमांहि पलाय। ज्यों दिनकर परकाशतैं अन्धकार विनशाय॥42॥ मारै जहाँ गयंद कुंभ हथियार विदारै। उमगै रुधिर प्रवाह वेग जलसम विस्तारै॥ होयतिरन असमर्थ महाजोधा बलपूरे। तिस रनमें जिन तोर भक्त जे हैं नर सूरे॥ दुर्जय अरिकुल जीतके जय पावैं निकलंक। तुम पद पंकज मन बसैं ते नर सदा निशंक॥43॥ नक्र चक्र मगरादि मच्छकरि भय उपजावै। जामैं बड़वा अग्नि दाहतैं नीर जलावै॥ पार न पावैं जास थाह नहिं लहिये जाकी। गरजै अतिगंभीर, लहर की गिनति न ताकी॥ सुखसों तिरैं समुद्र को, जे तुम गुन सुमराहिं। लोल कलोलन के शिखर, पार यान ले जाहिं॥44॥ महा जलोदर रोग, भार पीड़ित नर जे हैं। वात पित्त कफ कुष्ट, आदि जो रोग गहै हैं॥ सोचत रहें उदास, नाहिं जीवन की आशा। अति घिनावनी देह, धरैं दुर्गंध निवासा॥ तुम पद-पंकज-धूल को, जो लावैं निज अंग। ते नीरोग शरीर लहि, छिनमें होय अनंग॥45॥ पांव कंठतें जकर बांध, सांकल अति भारी। गाढी बेडी पैर मांहि, जिन जांघ बिदारी॥ भूख प्यास चिंता शरीर दुख जे विललाने। सरन नाहिं जिन कोय भूपके बंदीखाने॥ तुम सुमरत स्वयमेव ही बंधन सब खुल जाहिं। छिनमें ते संपति लहैं, चिंता भय विनसाहिं॥46॥ महामत गजराज और मृगराज दवानल। फणपति रण परचंड नीरनिधि रोग महाबल॥ बंधन ये भय आठ डरपकर मानों नाशै। तुम सुमरत छिनमाहिं अभय थानक परकाशै॥ इस अपार संसार में शरन नाहिं प्रभु कोय। यातैं तुम पदभक्त को भक्ति सहाई होय॥47॥ यह गुनमाल विशाल नाथ तुम गुनन सँवारी। विविधवर्णमय पुहुपगूंथ मैं भक्ति विथारी॥ जे नर पहिरें कंठ भावना मन में भावैं। मानतुंग ते निजाधीन शिवलक्ष्मी पावैं॥ भाषा भक्तामर कियो, हेमराज हित हेत। जे नर पढ़ैं, सुभावसों, ते पावैं शिवखेत॥48॥